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रूस-यूक्रेन जंग के बीच फिलीस्तीन-इजरायल संकट ने संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका पर सवाल उठा दिया है. संयुक्त राष्ट्र संघ की नाकामी की वजह से यूरोप और मिडिल ईस्ट के देश हिंसा की आग में झुलस रहे हैं. सोशल मीडिया पर लोगों ने संयुक्त राष्ट्र संघ के खिलाफ ही मोर्चा खोल दिया है. यूजर्स संयुक्त राष्ट्र संघ को अब ‘यूजलेस’ बता रहे हैं.
संयुक्त राष्ट्र संघ के इतिहास में यह पहली बार है, जब संघ की ओर से शांति अपील को लेकर कोई साझा बयान तक जारी नहीं किया गया है. हालांकि, संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने जरूर एक बयान दिया है.
गुटेरस ने इजरायल से विश्व कानून के तहत ही कार्रवाई करने की अपील की है. उन्होंने यह भी कहा कि अभी जो स्थिति बनी हुई है, उसे गाजापट्टी की हालात और भी खराब होंगे. इधर, संयुक्त राष्ट्र संघ के आधिकारिक हैंडल से पूरे मामले की जांच कराने की बात कही गई है.
मशहूर मानवाधिकार कार्यकर्ता दीका यासीन संयुक्त राष्ट्र संघ को बंद करने की मांग की है. यासीन का कहना है कि जो संगठन 75 साल में भी किसी विवाद को सुलझा नहीं पाए, उसे रहने का कोई औचित्य नहीं है. यासीन ने दुनिया में शांति स्थापित करने के लिए एक प्रभावी संगठन बनाने की मांग की है.
मलेशिया के पूर्व प्रधानमंत्री महातिर मोहम्मद ने इजरायल और फिलस्तीन संकट के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ को ही जिम्मेदार ठहराया है. महातिर ने दुनिया के लोगों से इस विवाद की जड़ में जाने की अपील की है. महातिर का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संगठन यूरोप के एजेंडे को रोकने में नाकाम है.
यह पहली बार है, जब दो देशों के जंग के बाद संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका पर सवाल उठ रहा है. पहले भी यूक्रेन के राष्ट्रपति वोल्दोमीर जेलेंस्की संयुक्त राष्ट्र संघ को अप्रभावी बता चुके हैं. जेलेंस्की का कहना था कि संयुक्त राष्ट्र संघ में झूठे लोग बैठते हैं, जो कुछ देशों के गलत काम को सही ठहराने का काम करता है.
संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना क्यों हुई थी?
पहले विश्वयुद्ध के बाद दुनिया के देशों में शांति स्थापित करने के लिए वुडरो विल्सन के नेतृत्व में राष्ट्र संघ की स्थापना की गई थी, लेकिन बर्साय की संधि की वजह से 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध छिड़ गया. यह युद्ध साल 1945 तक चला.
युद्ध के बीच ही संयुक्त राष्ट्र संघ बनाने की पहल की गई. हालांकि, शुरू में जापान और जर्मनी ने अपनी रजामंदी नहीं दी.
विश्वयुद्ध की समाप्ति के बाद 24 अक्टूबर 1945 को अमेरिका, रूस सहित 50 से अधिक देश सेन फ्रांसिस्को में एकजुट हुए और उन्होंने एक दस्तावेज पर हस्ताक्षर किया, जिसमें शांति स्थापित करने के लिए एक संगठन बनाने की बात कही गई. वर्तमान में इसे ‘संयुक्त राष्ट्र का चार्टर’ कहा जाता है.
संयुक्त राष्ट्र संघ के चार्टर में कुल 70 अनुच्छेद हैं. इसके अनुच्छेद-1 में कहा गया है कि इस संगठन का मुख्य काम दुनिया में शांति स्थापित करना है. अगर कहीं पर दो देशों के बीच विवाद है, तो उसे शांतिपूर्वक अंतरराष्ट्रीय कानून की सहायता से हल करने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ प्रतिबद्ध है.
संयुक्त राष्ट्र संघ के कुल 6 प्रमुख अंग है, जो अलग-अलग क्षेत्रों में काम करती है. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद, यानी संयुक्त राष्ट्र संघएससी संयुक्त राष्ट्र संघ के छह प्रमुख अंगों में से एक है, जो पूरी दुनिया में शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करती है.
इजरायल-फिलस्तीन ही नहीं, यहां भी जंग नहीं रोक पाया संयुक्त राष्ट्र संघ
1 .रूस और यूक्रेन का युद्ध- फरवरी 2022 में रूस ने यूक्रेन पर हमला कर दिया था. रूस यूक्रेन के नाटो में शामिल होने के फैसले से नाराज था. रूसी हमले की वजह से यूक्रेन के 10 बड़े शहर बर्बाद हो गए. स्टेटिस्टा के मुताबिक सितंबर 2023 तक इस जंग में यूक्रेन के 9614 लोगों की मौत हो चुकी है, जिसमें 554 बच्चे हैं.
कीव इंडिपेंडेंट के अनुसार यूक्रेन से युद्ध में रूस के 2 लाख 83 हजार सैनिक अब तक मारे गए हैं. हालांकि, रूस यूक्रेन के इस दावे को लगातार खारिज करता रहा है. यूरोपीय मीडिया के मुताबिक रूस यूक्रेन से जंग लड़ने के लिए लगातार प्राइवेट आर्मी का इस्तेमाल कर रहा है.
संयुक्त राष्ट्र संघ में युद्ध रोकने और रूस पर एक्शन लेने के लिए कई बार प्रस्ताव आया, लेकिन रूस और चीन के विरोध की वजह से यह प्रस्ताव लटक गया. दोनों देशों के बीच अब भी जंग जारी है
2. वियतनाम और अमेरिका का युद्ध- यह युद्ध संयुक्त राष्ट्र के गठन के 10 साल बाद ही शुरू हो गया था. संयुक्त राष्ट्र संघ इसे भी रोकने में पूरी तरह विफल रहा. यह युद्ध करीब 10 सालों तक चला, जिसमें वियतनाम के 20 लाख आम नागरिक मारे गए. अमेरिका को भी युद्ध में काफी नुकसान हुआ और उसके 55 हजार सैनिकों ने जान गंवाई.
आंतरिक और बाहरी दबाव के बाद अंत में अमेरिका ने वियतनाम युद्ध में खुद की हार स्वीकार ली. 2008 में स्टीफन डिगेट ने अमेरिकी कांग्रेस के हवाले से दावा किया कि वियतनाम युद्ध में अमेरिका ने करीब 686 अरब डॉलर खर्च किए, जो आज के समय 950 अरब डॉलर से ज्यादा हैं.
3. इराक और ईरान के बीच संघर्ष- मध्य-पूर्वी के इराक और ईरान में 22 सितंबर 1980 को युद्ध छिड़ गया. इराकी सेना ने पश्चिमी ईरान की सीमा में घुसपैठ कर उस पर हमला कर दिया था. दोनों देशों के बीच करीब 8 सालों तक युद्ध चला, जिसमें 10 लाख लोग मारे गए.
इराक और ईरान के संघर्ष को भी रोकने में संयुक्त राष्ट्र संघ पूरी तरह नाकाम रहा. युद्ध में इराक को पश्चिमी देशों का साथ मिला था. 1988 में सैन्य संशाधन से जूझ रहे ईरान और इराक ने संधि की घोषणा कर दी. दुनिया के दो देशों क बीच यह पहला युद्ध था, जिसमें रसायनिक हथियारों का प्रयोग किया गया था.
4. रवांडा का नरसंहार और फ्रांस की भूमिका- यह दो देशों के बीच का युद्ध नहीं था, लेकिन इसकी गूंज पूरी दुनिया में सुनाई दी.पहली बार किसी देश के आंतरिक युद्ध में 8 लाख लोग मारे गए. दरअसल, 1994 में अफ्रीका के रवांडा में दो समुदाय ने एक-दूसरे के खिलाफ युद्ध का ऐलान कर दिया.
एक तरफ बहुसंख्यक हूतू तो दूसरी तरफ अल्पसंख्यक तूत्सी समुदाय था. लड़ाई की शुरुआत हूतू ने किया था. इस संघर्ष में फ्रांस की भी काफी आलोचना हुई. फ्रांस पर आरोप था कि उसके सैनिकों ने रवांडा में मौजूद होने के बावजूद तूत्सी की रक्षा नहीं की.
2021 में फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने इसके लिए माफी भी मांगी. हालांकि, इस लड़ाई में संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका सबसे ज्यादा सवालों के घेरे में रही.
5. बोस्निया का गृह युद्ध- 1992 में यूगोस्लाविया के विभाजन के बाद सर्ब और मुस्लिम समुदाय के बीच नए राष्ट्र को लेकर विवाद शुरू हो गया. संयुक्त राष्ट्र संघ दोनों के बीच समझौता कराने में विफल रहा, जिसके बाद धीरे-धीरे विवाद जंग में तब्दील हो गया और 1995 में सर्ब समुदाय के सैनिकों ने 8 हजार मुसलमानों को ब्लैक प्वॉइंट पर ले जाकर गोली मार दी.
गोली मारे जाने के बाद पूरी दुनिया हरकत में आ गई. इस्लामिक देशों के विरोध को देखते हुए आनन-फानन में नाटों ने यहां पर अपने सेना उतार दिए, जिसके बाद हिंसा पर कंट्रोल पाया गया.
संयुक्त राष्ट्र संघ का सालाना बजट 2321 करोड़, मुख्य स्रोत चंदा
संयुक्त राष्ट्र संघ का सालाना बजट करीब 2321 करोड़ रुपए है, जो चंदा के जरिए संयुक्त राष्ट्र संघ जुटाता है. संयुक्त राष्ट्र संघ वेबसाइट के मुताबिक 2023 में उसे 137 देशों ने चंदा दिया है. संयुक्त राष्ट्र संघ को सबसे ज्यादा चंदा अमेरिका की ओर से मिला है.
2024 में भारत ने करीब 24 करोड़ रुपए संयुक्त राष्ट्र संघ को बतौर चंदा दिया है. यह कुल बजट का 1 प्रतिशत से ज्यादा है. संयुक्त राष्ट्र संघ चार्टर के अनुच्छेद 18 के मुताबिक बजट कहां और कैसे खर्च किया जाएगा, उसका फैसला महासभा की बैठक में लिया जाता है.
करोड़ों का बजट फिर भी युद्ध क्यों नहीं रोक पाता है यूएन?
2021 में संयुक्त राष्ट्र संघ में एक संबोधन के दौरान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी संयुक्त राष्ट्र संघ की भूमिका पर सवाल उठाया था. नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार के लिए वीटो को एक महत्वपूर्ण फैक्टर बताते हुए कहा था कि वैश्विक परिदृश्य को देखते हुए अगर इसमें बदलाव नहीं किया गया तो इसकी प्रासंगिकता नहीं रह जाएगी.
संयुक्त राष्ट्र संघ के हर मोर्चे पर विफल रहने के पीछे वीटो पॉलिसी को ही वजह माना जा रहा है. वर्तमान में अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन और फ्रांस को संयुक्त राष्ट्र संघ में वीटो शक्ति मिला हुआ है. इनमें से 4 देश द्वितीय विश्वयुद्ध में एकसाथ थे.
संयुक्त राष्ट्र संघ के पूर्व महासचिव बुतरस-बुतरस घाली अपने ऑटोबायोग्राफी ‘अनवांक्विश्ड: ए यूएस-संयुक्त राष्ट्र संघ सागा’ में संयुक्त राष्ट्र के भीतर वीटो वाले देशों के दबदबे के बारे में जिक्र किया है.
घाली के मुताबिक वीटो पावर देश अपने हिसाब से यूनाइटेड नेशन को चलाना चाहते हैं और इस वजह से कई मामले में बड़ा फैसला नहीं हो पाता है. घाली अपने ऑटोबायोग्राफी में लिखते हैं- वीटो सिस्टम को खत्म किए बिना संयुक्त राष्ट्र संघ से बड़ा फैसला लेने की अपेक्षा करना बेमानी है.
मशहूर ब्रिटिश टिप्पणीकार नील गार्डेनर कहते हैं- संयुक्त राष्ट्र संघ के फेल होने के पीछे कई कारण हैं. इसमें सबसे प्रमुख उसका कमजोर नेतृत्व है, जो सही वक्त पर सही फैसला नहीं ले पाता है. खराब प्रबंधन की वजह से ही संयुक्त राष्ट्र संघ पर सवाल उठता है.
गार्डेनर संयुक्त राष्ट्र संघ के नेतृत्व को बीमार बताते हुए कहते हैं- यह एक दिशाहीन संगठन बन चुका है, जो 21वीं सदी के हिसाब से काम नहीं कर रहा है. अगर आने वाले वक्त में भी इसका ढर्रा नहीं बदलेगा, तो यह पूरी तरह अप्रासंगिक हो जाएगा.
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