दिल्ली से केरल तक ‘ दिखा भारत बंद’ का असर, बैंक-परिवहन समेत कई सेवाएं बाधित, जगह-जगह ट्रेड यूनियनों का प्रदर्शन

केंद्र सरकार की कथित "कर्मचारी-विरोधी, किसान-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कॉरपोरेट-समर्थक नीतियों" के विरोध में बुधवार, 9 जुलाई को देशभर में भारत बंद का असर देखा गया। राजधानी दिल्ली से लेकर दक्षिण के राज्य केरल तक जगह-जगह ट्रेड यूनियन से जुड़े कर्मचारी सड़कों पर उतरकर विरोध-प्रदर्शन किया। 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और उनके सहयोगियों के एक मंच द्वारा बुलाए गए इस बंद में 25 करोड़ से अधिक कर्मचारियों और श्रमिकों के शामिल होने का दावा किया गया।

भारत बंद के आह्वान पर देश के अलग-अलग हिस्सों ने कर्मचारी संगठनों ने किया प्रदर्शन। सोशल मीडिया

केंद्र सरकार की कथित “कर्मचारी-विरोधी, किसान-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी कॉरपोरेट-समर्थक नीतियों” के विरोध में बुधवार, 9 जुलाई को देशभर में भारत बंद का असर देखा गया। राजधानी दिल्ली से लेकर दक्षिण के राज्य केरल तक जगह-जगह ट्रेड यूनियन से जुड़े कर्मचारी सड़कों पर उतरकर विरोध-प्रदर्शन किया। 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों और उनके सहयोगियों के एक मंच द्वारा बुलाए गए इस बंद में 25 करोड़ से अधिक कर्मचारियों और श्रमिकों के शामिल होने का दावा किया गया।

केंद्र सरकार की चार नई श्रम संहिताओं सहित कथित श्रमिक विरोधी नीतियों के विरोध में 10 श्रमिक संगठनों द्वारा आहूत राष्ट्रव्यापी हड़ताल के कारण बुधवार को पुडुचेरी में निजी बसें, ऑटो और टेंपो सड़कों से नदारद दिखे। निजी स्कूलों के प्रबंधन ने एहतियात के तौर पर छुट्टी की घोषणा की, जबकि दुकानें, प्रतिष्ठान्न, सब्जी एवं मछली बाजार बंद रहे। श्रम संगठनों की मांगों में चार श्रम संहिताओं को खत्म करना, ठेका प्रणाली समाप्त करना, सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों का निजीकरण बंद करना तथा न्यूनतम मजदूरी को बढ़ाकर 26,000 रुपये प्रति माह करना शामिल है।

किसानों के ऋण माफी की उठाई मांग

इसके अलावा किसान संगठनों की मांगें भी शामिल हैं, जो स्वामीनाथन आयोग के सी2 प्लस 50 प्रतिशत के फॉर्मूले के आधार पर फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य और किसानों के लिए ऋण माफी की मांग कर रहे हैं। सरकारी कार्यालयों में विभागाध्यक्षों ने उपस्थिति की निगरानी की। सूत्रों ने बताया कि विभागाध्यक्षों को आज अनुपस्थित रहने वाले कर्मचारियों का विवरण अनिवार्य रूप से प्रस्तुत करने को कहा गया है।

बंद का आह्वान और मुख्य आयोजक

यह हड़ताल 10 केंद्रीय ट्रेड यूनियनों – अखिल भारतीय ट्रेड यूनियन कांग्रेस (एआईटीयूसी), इंडियन नेशनल ट्रेड यूनियन कांग्रेस (इंटक), सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियंस (सीआईटीयू), हिंद मजदूर सभा (एचएमएस), अखिल भारतीय संयुक्त ट्रेड यूनियन सेंटर (एआईयूटीयूसी), सेल्फ-एम्प्लॉयड वुमेन्स एसोसिएशन (एसईडब्लूए), अखिल भारतीय केंद्रीय ट्रेड यूनियन परिषद (एआईसीसीटीयू), ट्रेड यूनियन समन्वय केंद्र (टीयूसीसी), लेबर प्रोग्रेसिव फेडरेशन (एलपीएफ), और यूनाइटेड ट्रेड यूनियन कांग्रेस (यूटीयूसी) – द्वारा किया गया था। इन यूनियनों ने औपचारिक और अनौपचारिक दोनों क्षेत्रों के श्रमिकों से हड़ताल को “एक बड़ी सफलता” बनाने का आग्रह किया था। किसान संगठन और ग्रामीण श्रमिक भी इस विरोध में शामिल हुए।

क्या-क्या प्रभावित हुआ

  • सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों और सहकारी बैंकों में कामकाज ठप रहा, जिससे चेक क्लियरिंग और अन्य ग्राहक सेवाएँ प्रभावित हुईं।
  • डाक वितरण और संबंधित सेवाओं में भी व्यवधान देखा गया।
  • कोयला खनन और विभिन्न कारखानों में काम रुक गया।
  • राज्यों में सार्वजनिक परिवहन सेवाएं, जिनमें सरकारी बसें और कुछ निजी बसें शामिल थीं, आंशिक रूप से या पूरी तरह से ठप रहीं, जिससे यात्रियों को परेशानी हुई।
  • सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयाँ और सरकारी विभागों में कामकाज धीमा रहा या आंशिक रूप से बंद रहा।
  • लगभग 27 लाख बिजली क्षेत्र के कर्मचारियों ने भी विरोध प्रदर्शन में भाग लिया, जिससे कुछ क्षेत्रों में बिजली आपूर्ति बाधित हुई, हालांकि देशव्यापी ब्लैकआउट जैसी स्थिति नहीं बनी।
  • निजी कार्यालय और स्कूल अधिकतर खुले रहे, लेकिन परिवहन संबंधी कठिनाइयों के कारण कर्मचारियों और छात्रों की उपस्थिति कम रही।
  • आपातकालीन सेवाएं, मेट्रो सेवाएँ और हवाई यात्राएँ अप्रभावित रहीं।

विरोध का कारण- कर्मचारी-विरोधी नीतियों का आरोप

ट्रेड यूनियनों ने सरकार की नीतियों को कर्मचारी-विरोधी, किसान-विरोधी और राष्ट्र-विरोधी बताते हुए अपना विरोध दर्ज कराया। उनके मुख्य तर्क और शिकायतें यह थीं।

  • चार नए श्रम संहिताएँ (लेबर कोड): यूनियनों का आरोप है कि ये संहिताएँ श्रमिकों की सुरक्षा को कमजोर करेंगी, काम के घंटे बढ़ाएंगी, ट्रेड यूनियनों को कमजोर करेंगी और हड़ताल तथा सामूहिक सौदेबाजी को कठिन बनाएंगी।
  • बढ़ती बेरोजगारी और महंगाई: देश में बढ़ती बेरोजगारी, विशेषकर युवाओं में, और आवश्यक वस्तुओं की बढ़ती कीमतों को लेकर चिंता व्यक्त की गई।
  • सार्वजनिक सेवाओं में कटौती: स्वास्थ्य, शिक्षा और नागरिक सेवाओं पर सरकारी खर्च में कटौती का आरोप लगाया गया।
  • सेवानिवृत्त कर्मियों की भर्ती: यूनियनों ने युवाओं के लिए नई नौकरियां सृजित करने के बजाय सेवानिवृत्त कर्मियों को भर्ती करने की सरकार की नीति की आलोचना की।
  • संवाद तंत्र की कमी: उनका दावा है कि सरकार ने औपचारिक संवाद तंत्रों को नजरअंदाज किया है और पिछले एक दशक से भारतीय श्रम सम्मेलन आयोजित नहीं किया है।

प्रदर्शनकारियों की प्रमुख माँगें

  • चारों श्रम संहिताओं को वापस लेना।
  • सार्वजनिक क्षेत्र की इकाइयों और सेवाओं के निजीकरण को रोकना।
  • न्यूनतम मजदूरी की गारंटी और सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करना।
  • ठेकेदारी प्रथा पर रोक लगाना।
  • भारतीय श्रम सम्मेलन को बहाल करना।
  • सार्वजनिक कल्याण सेवाओं में निवेश बढ़ाना।
  • युवाओं के लिए अधिक रोजगार सृजित करना और सरकारी रिक्तियों को नई भर्तियों से भरना।
  • मनरेगा मजदूरी बढ़ाना और योजना का शहरी क्षेत्रों तक विस्तार करना।

राज्यों में असर और चेतावनी

पश्चिम बंगाल, केरल, झारखंड, कर्नाटक, तमिलनाडु और बिहार जैसे राज्यों से बंद के व्यापक असर की खबरें मिलीं। कुछ स्थानों पर प्रदर्शनकारियों ने रेलवे ट्रैक और सड़कों को जाम कर दिया। तमिलनाडु सरकार ने हड़ताल में भाग लेने वाले सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की चेतावनी जारी की थी। कुल मिलाकर, 9 जुलाई का ‘भारत बंद’ देश के श्रमिक संगठनों के विरोध का एक मजबूत प्रदर्शन था, जिसने सरकार की आर्थिक और श्रम सुधार नीतियों पर अपनी चिंताओं को उजागर किया।

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