
मध्य यूपी के कानपुर, उन्नाव, कानपुर देहात और लखनऊ जनपदों में नागपंचमी के त्योहार का विशेष महत्व है। मूल रूप से इस त्योहार को भाई-बहन के प्रेम से जोड़कर मनाया जाता है। इस दिन गुडि़या को पीटने की अनोखी परम्परा है, जो कई पीढियों से चली आ रही है। आइये जानते हैं इस अनोखी परम्परा के बारे में।
परंपरा के अनुसार, नागपंचमी के त्योहार पर बहनें गुडिया बनाकर शाम को तालाब के किनारे ले जाकर उन्हें डालती हैं। इसके बाद भाई सजे-धजे लाठी व डंडों से गुडियों को पीटते हैं। इसके पीछे बहनों का प्रायश्चित होता है। मंगलवार को ग्रामीण क्षेत्रों में कुंवारी कन्याओं ने विधि विधान के साथ पूजन किया। इसके बाद उन्होंने गुड़िया डालने की परंपरा निभाई।
भाई की रक्षा के लिए बहन ने की थी नाग की हत्या
बुजुर्गों के अनुसार, नागपंचमी पर गुड़िया पीटने के पीछे एक अनोखी पौराणिक कथा है। मान्यता है कि एक भाई शिव और नाग देवता का बहुत बड़ा भक्त था। वह प्रतिदिन मंदिर में शिव जी की पूजा करने जाता था। उसकी असीम भक्ति देखकर नाग देवता प्रतिदिन मंदिर में उसे दर्शन देने लगे और कई बार पूजा के दौरान उसके पैरों में लिपट जाते थे।
नागपंचमी के दिन वह अपनी बहन को भी साथ लेकर मंदिर पूजा के लिए गया। जब पूजा के दौरान नाग देवता भाई के पैरों में लिपट गए, तब बहन ने उन्हें देखा और डर के मारे डंडे से मार दिया। जब भाई को यह बात पता चली, तो उसने बहन को बताया कि उसने अनजाने में एक पूजनीय देवता को कष्ट पहुंचाया है। इसी गलती के कारण तब से बहनें कपड़े की गुड़िया बनाती हैं और भाई उसे पीटते हैं।
सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी को मनाते हैं
यह त्योहार सावन मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन गुड़िया पूजन और गुड़िया डालने की प्रथा हिंदू परंपरा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कुंवारी कन्याओं द्वारा विशेष विधि-विधान से की जाने वाली यह पूजा शुभ मानी जाती है। मंगलवार को भी विधि-विधान से त्योहार मनाया गया।

उज्जैन में पांच लाख भक्तों ने किए नागचंद्रेश्वर के दर्शन
ज्योतिर्लिंग महाकाल मंदिर में नागपंचमी पर भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन के लिए दर्शनार्थियों की लंबी कतार लगी रही। सोमवार-मंगलवार की दरमियानी रात 12 बजे पट खुलने के बाद शुरू हुआ दर्शन का सिलसिला मंगलवार रात 12 बजे तक चला। मंदिर प्रशासन के अनुसार 24 घंटे में पांच लाख से अधिक भक्तों ने भगवान नागचंद्रेश्वर के दर्शन किए।
नागपंचमी पर भगवान नागचंद्रेश्वर की त्रिकाल पूजा की परंपरा हैं। प्रथम पूजा सोमवार-मंगलवार की मध्यरात्रि 12 बजे मंदिर के पट खुलने के बाद महानिर्वाणी अखाड़े के महंत गिरी महाराज ने की थी। दूसरी पूजा मंगलवार दोपहर 12 बजे शासन की ओर से जिला प्रशासन के अधिकारियों ने की।
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