Rama Ekadashi Vrat 2023: आज है रमा एकादशी व्रत, जानें मुहूर्त, पूजा विधि, मंत्र, कथा और महत्व

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हाइलाइट्स

रमा एकादशी पर पूजा का शुभ मुहूर्त: प्रात: 06:38 बजे से सुबह 09:21 बजे तक.
रमा एकादशी व्रत पारण समय: कल, सुबह 06:39 ए एम से 08:50 ए एम तक.
इस व्रत को करने से पाप से मुक्ति मिलती है और मोक्ष की प्राप्ति होती है.

आज 9 नवंबर को रमा एकादशी व्रत है. कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को रमा एकादशी का व्रत रखा जाता है. आज के दिन भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और रमा एकादशी व्रत कथा सुनते हैं. इस व्रत को करने से पाप और कष्ट से मुक्ति मिलती है. भगवान विष्णु के आशीर्वाद से जीवन के अंत में मोक्ष की प्राप्ति होती है. रमा एकादशी नवंबर और कार्तिक माह का पहला एकादशी व्रत है. तिरुपति के ज्योतिषाचार्य डॉ. कृष्ण कुमार भार्गव से जानते हैं रमा एकादशी व्रत की पूजा विधि, मुहूर्त, मंत्र और व्रत कथा के बारे में.

रमा एकादशी 2023 शुभ मुहूर्त
कार्तिक कृष्ण एकादशी तिथि का प्रारंभ: आज, सुबह 08:23 ए एम से
कार्तिक कृष्ण एकादशी तिथि का समापन: कल, सुबह 10:41 ए एम पर
रमा एकादशी पर पूजा का शुभ मुहूर्त: प्रात: 06:38 बजे से सुबह 09:21 बजे तक

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रमा एकादशी व्रत पारण समय
कल, सुबह 06:39 ए एम से 08:50 ए एम तक

रमा एकादशी व्रत और पूजा विधि
आज सुबह स्नान करने के बाद पीले रंग के कपड़े पहनें. हाथ में जल लेकर रमा एकादशी व्रत और विष्णु पूजा का संकल्प लें. फिर शुभ मुहूर्त में भगवान विष्णु की मूर्ति या तस्वीर की स्थापना करें. उनको अक्षत्, पीले फूल, धूप, दीप, गंध, हल्दी, तुलसी के पत्ते, पंचामृत आदि अर्पित करें. श्रीहरि को गुड़, चने की दाल, बेसन के लड्डू का भोग लगाएं. पूजन सामग्री अर्पित करते समय ओम नमो भगवते वासुदेवाय मंत्र का उच्चारण करें.

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फिर विष्णु सहस्रनाम और रमा एकादशी व्रत कथा का पाठ करें. पूजा के अंत में भगवान विष्णु की आरती करें. दिनभर फलाहार पर रहें. रात्रि के समय में जागरण करें. अगले दिन सुबह स्नान के बाद पूजा पाठ करें. किसी गरीब ब्राह्मण को दान और दक्षिणा से संतुष्ट करें. फिर शुभ समय में पारण करके व्रत को पूरा करें.

रमा एकादशी व्रत कथा
प्राचीन काल में एक राजा था, जिसका नाम मुचुकुंद था. उसकी पुत्री का नाम चंद्रभागा था. उसका विवाह चंद्रसेन के बेटे शोभन से हुआ था. एक दिन शोभन ससुराल आया. रमा एकादशी से एक दिन पहले राजा मुचुकुंद ने पूरे नगर में घोषणा करा दी कि रमा एकादशी को किसी को भोजन नहीं करना चाहिए. यह सुनकर शोभन परेशान हो गया. उसने पत्नी से कहा कि बिना भोजन के वह जीवित नहीं रह सकता.

उसकी पत्नी ने कहा कि आप कहीं और चले जाइए. यदि यहां रहेंगे तो आपको व्रत रहना होगा. शोभन ने कहा कि भाग्य में जो होगा, वो देखा जाएगा. वह व्रत रखेगा. उसने रमा एकादशी का व्रत रखा, लेकिन भूख से व्याकुल हो गया. रात्रि का जागरण का समय आया तो वह बहुत दुखी हुआ और सुबह तक उसके प्राण निकल गए. उसका अंतिम संस्कार हुआ और चंद्रभागा मायके में ही रहने लगी.

रमा एकादशी व्रत के पुण्य प्रभाव से शोभन को मंदराचल पर्वत पर सुंदर देवपुर प्राप्त हुआ. मुचुकुंद नगर का एक ब्राह्मण एक दिन शोभन के नगर में गया. उसने मुलाकात करके उसकी पत्नी का पूरा हाल बताया. उसने पूछा कि आपको ऐसा नगर कैसे मिला? शोभन ने उसे रमा एकादशी के पुण्य प्रभाव के बारे में बताया. उसने कहा कि यह नगर अस्थिर है, आप चंद्रभागा से इसके बारे में बताना.

वह ब्राह्मण अपने घर गया और अगले दिन चंद्रभागा को पूरी बात बताई. चंद्रभागा उस ब्राह्मण के साथ शोभन के नगर के लिए निकल पड़ी. रास्ते में मंदराचल पर्वत के पास वामदेव ऋषि के आश्रम में वे दोनों गए. वहां वामदेव ने चंद्रभागा का अभिषेक किया. मंत्र और एकादशी व्रत के प्रभाव से चंद्रभागा का शरीर दिव्य हो गया और उसको दिव्य गति मिली.

उसके बाद वह अपने पति शोभन के पास गई. उसने चंद्रभागा को अपनी बाईं ओर बिठाया. उसने अपने पति को एकादशी व्रत का पुण्य प्रदान किया, जिससे उसका नगर स्थिर हो गया. उसने बताया कि व्रत के पुण्य प्रभाव से यह नगर प्रलय के अंत तक स्थिर रहेगा. उसके बाद दोनों सुखपूर्वक रहने लगे.

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